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खजूरी थाना: राजधानी दिल्ली का एक डूबता सच

दिल्ली, देश की राजधानी

पत्रकार : जगमोहन सिंह

एक ऐसा शहर जिसे “भारत का दिल” कहा जाता है, लेकिन इसी दिल के उत्तर-पूर्वी हिस्से में एक ऐसा जख्म है जो न सिर्फ बदहाल है, बल्कि प्रशासन की उदासीनता और राजनीतिक दिखावे का बड़ा प्रतीक बन चुका है—खजूरी थाना।

खजूरी थाना क्षेत्र, जो उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास इलाके में स्थित है, वहां की तस्वीर किसी गांव या पिछड़े कस्बे की नहीं, बल्कि राजधानी के एक उपेक्षित कोने की कहानी कहती है। यह थाना हर साल, हर मौसम में जलजमाव का शिकार होता है। थाने के चारों ओर गंदा पानी भर जाता है, जो कभी-कभी膝 (घुटने) तक पहुँच जाता है।

यह इलाका घनी आबादी वाला, निम्न आय वर्ग का क्षेत्र है जहाँ अपराध की घटनाएं भी सामान्य से कहीं अधिक होती हैं। इसका सीधा असर थाने पर पड़ता है—हर रोज़ यहां बड़ी संख्या में पीड़ित अपनी शिकायतें लेकर आते हैं। लेकिन अफसोस! उन्हें अपनी आवाज़ उठाने के लिए पहले गंदे और बदबूदार पानी से होकर गुजरना पड़ता है।

आम जनता की मजबूरी देखिए: अपराध से परेशान व्यक्ति को गंदे पानी से होकर थाने तक पहुंचना जरूरी है, क्योंकि अन्य कोई विकल्प नहीं है। सरकार से उम्मीद करना तो इस इलाके की जनता कब का छोड़ चुकी है।

क्या यही है “दिल्ली मॉडल”? क्या यही है “आपकी सरकार”?

अगर यही स्थिति दक्षिणी दिल्ली के किसी पॉश इलाके में होती, क्या तब भी इतनी चुप्पी रहती? क्या तब भी पानी महीनों जमा रहता? शायद नहीं। लेकिन खजूरी का दर्द केवल इसलिए अनसुना है क्योंकि यहां बसने वाले लोग गरीब हैं, मजबूर हैं और शायद “वोट बैंक” में गिनने के बाद भुला दिए गए हैं।

जिम्मेदार कौन?

दिल्ली सरकार के मंत्री और खजूरी क्षेत्र के विधायक कपिल मिश्रा कोई छोटे-मोटे नेता नहीं हैं। वे सरकार में एक समय प्रभावशाली पद पर रहे हैं, और आज भी खुद को दिल्ली का “शेर” बताने से पीछे नहीं हटते। फिर भी खजूरी का ये हाल बताता है कि या तो वह इस दुर्दशा से अनजान हैं, या फिर उन्होंने आंखें मूंद रखी हैं।

जब जनता के प्रतिनिधि ही आंख मूंद लें, तो अधिकारी क्या करेंगे?

थाने के SHO से लेकर सिपाही तक—जो लोग जनता की मदद के लिए दिन-रात ड्यूटी कर रहे हैं—उन्हें भी इसी पानी से होकर गुजरना पड़ता है। सोचिए, एक हेड कांस्टेबल या एएसआई जब कोर्ट में पेशी के लिए जाता है और उसकी वर्दी गंदी होती है, तो क्या वह जज को बता पाता है कि साहब, मैं खजूरी थाने से आया हूँ, जहां आज भी “विकास” नहीं पहुंचा?

बड़े पुलिस अधिकारी, चाहे ACP हों या DCP—गाड़ियों में बैठकर आते हैं, फाइलों में साइन कर चले जाते हैं। उन्हें शायद ही इस पानी में चलने की मजबूरी हो। लेकिन ज़मीनी हकीकत हर उस सिपाही की वर्दी पर लिखी जाती है, जो इस गंदगी से होकर निकलता है, हर उस महिला की चप्पल पर चिपकी होती है, जो न्याय की आस में थाने तक आती है।

अब सवाल यह है: कब बदलेगी तस्वीर?

क्या दिल्ली के इस हिस्से को राजधानी मानने से प्रशासन ने इंकार कर दिया है?

क्या कपिल मिश्रा जैसे नेताओं को अपनी ही विधानसभा की यह हालत नहीं दिखती?

क्या ACP और DCP स्तर के अधिकारियों ने कभी यह देखा है कि उनके मातहत किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं?

खजूरी के लोग आज सिर्फ बेहतर कानून-व्यवस्था नहीं, सम्मान और बुनियादी सुविधा की मांग कर रहे हैं। पानी निकालना कोई “रॉकेट साइंस” नहीं है। बस ज़रा-सी राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।

प्रशासन सुन ले—अब आवाज़ बुलंद होगी

यह लेख सिर्फ एक खबर नहीं है, यह एक चेतावनी है। अब खजूरी की जनता चुप नहीं बैठेगी। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, हर मंच पर इस बदहाली की तस्वीर को रखा जाएगा। क्योंकि एक लोकतंत्र में “शासन वही होता है जो जनता की आवाज़ से डरे”, न कि जनता को डराकर चुप कराए।

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