एडवोकेट संतोष शुक्ला और रक्षपाल सिंह की अद्वितीय पैरवी से 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में हिंदू आरोपी बरी
दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले में फरवरी 2020 में हुए साम्प्रदायिक दंगों ने देश को हिलाकर रख दिया था। इस दौरान कई दुकानें लूटी गईं और आगजनी की घटनाओं ने शहर को दहला दिया। इन्हीं घटनाओं में खजूरी खास थाना क्षेत्र के अंतर्गत दर्ज एफआईआर संख्या 197/2020 में छः लोगों, राजिंदर झा, तेज़वीर चौधरी, पीताम्बर झा, गोविन्द सिंह, देवेंद्र शर्मा और राजेश झा कों आरोपी बनाया गया था। इन पर दंगों के दौरान दुकानों में लूटपाट और आगजनी का आरोप था।
हाल ही में कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और प्रस्तुत गवाहियों व सबूतों में गंभीर विरोधाभास थे।
एडवोकेट संतोष शुक्ला का महत्वपूर्ण योगदान
इस केस में पांच आरोपियों की ओर से सुप्रसिद्ध अधिवक्ता श्री संतोष शुक्ला और रक्षपाल सिंह ने पैरवी की। संतोष शुक्ला जी अपने हिंदूवादी विचारों और निडर कानूनी शैली के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अदालत में बेहद सटीक तर्कों और ठोस कानूनी बिंदुओं के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि उनके क्लाइंट निर्दोष हैं।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष की कहानी में कई गंभीर खामियां हैं। न तो गवाह आरोपियों की सही पहचान कर पाए, न ही सबूत अदालत में टिक सके। संतोष शुक्ला जी और रक्षपाल सिंह जी की और से गहन तैयारी और तथ्यात्मक प्रस्तुति ने इस केस की दिशा बदल दी।
अदालत का निर्णय
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री प्रवीन सिंह ने 23 जुलाई 2025 को अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि सभी आरोपियों को सभी चार्जेस से बरी किया जाता है। उनके बेल बॉन्ड भी निरस्त कर दिए गए। आदेश शीट में साफ लिखा गया कि अभियोजन पक्ष का केस संदेहों से घिरा रहा और आरोपियों को दोषी ठहराने का कोई ठोस आधार नहीं मिला।
संतोष शुक्ला – हिंदूवादी विचारधारा के सशक्त प्रवक्ता
श्री संतोष शुक्ला जी का मानना है कि न्याय केवल सबूतों और सत्य के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक या साम्प्रदायिक दबाव में। इस केस में उन्होंने न केवल अपने मुवक्किलों को कानूनी सुरक्षा दी, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि न्यायपालिका में सच्चाई और दमदार पैरवी से हर निर्दोष को न्याय मिल सकता है।
इस फैसले ने यह भी साबित किया कि 2020 के दंगों में फंसाए गए कई निर्दोष हिंदू युवकों को सही कानूनी मार्गदर्शन और मजबूत बचाव की कितनी आवश्यकता थी। संतोष शुक्ला जी ने अपनी विचारधारा और कानूनी विशेषज्ञता से इस दिशा में एक मिसाल पेश की है।
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